परिचय

AEPDS का इतिहास, विकास एवं महत्व

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 से लेकर आज तक की डिजिटल यात्रा।

अस्वीकरण: यह एक सूचनात्मक वेबसाइट है, अधिकृत सरकारी साइट नहीं। आधिकारिक जानकारी के लिए अपने राज्य के खाद्य आपूर्ति विभाग के पोर्टल को देखें।

AEPDS का इतिहास और विकास

भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) दशकों पुरानी है, लेकिन पारंपरिक प्रणाली में फर्जी राशन कार्ड, डुप्लीकेट लाभार्थी, अनाज की चोरी और वितरण में अनियमितता जैसी अनेक समस्याएं थीं। इन समस्याओं को हल करने के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (NFSA) लागू किया और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के डिजिटलीकरण की शुरुआत की।

इसी क्रम में आधार को राशन कार्ड से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई और उचित मूल्य दुकानों पर ई-पीओएस (e-PoS) मशीनें लगाई गईं। इसी डिजिटल ढांचे को AEPDS कहा जाता है। धीरे-धीरे सभी राज्यों ने अपने-अपने AEPDS पोर्टल विकसित किए, जो राष्ट्रीय PDS पोर्टल से जुड़े हुए हैं।

आज AEPDS प्रणाली के माध्यम से देश के करोड़ों लाभार्थी हर महीने सब्सिडी वाला खाद्यान्न प्राप्त करते हैं और उनका पूरा लेन-देन डिजिटल रूप से दर्ज होता है।

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AEPDS का उद्देश्य और महत्व

पारदर्शिता

राशन वितरण प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता लाना।

धोखाधड़ी रोकथाम

फर्जी राशन कार्ड और डुप्लीकेट लाभार्थियों को समाप्त करना।

सही लाभार्थी

राशन केवल पात्र व्यक्ति तक पहुंचे यह सुनिश्चित करना।

डिजिटल रिकॉर्ड

हर लेन-देन का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखना।

पोर्टेबिलिटी

प्रवासी श्रमिकों को देश में कहीं भी राशन उपलब्ध कराना।

निगरानी

रियल-टाइम स्टॉक एवं वितरण निगरानी।

AEPDS प्रणाली की मुख्य उपलब्धियां

  • फर्जी और डुप्लीकेट राशन कार्डों की पहचान कर उन्हें रद्द किया गया।
  • उचित मूल्य दुकानों पर ई-पीओएस मशीनों द्वारा बायोमेट्रिक वितरण अनिवार्य हुआ।
  • वन नेशन वन राशन कार्ड (ONORC) से अंतर-राज्यीय पोर्टेबिलिटी संभव हुई।
  • राशन वितरण का रियल-टाइम डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हुआ।
  • लाभार्थियों की शिकायत निवारण प्रक्रिया ऑनलाइन उपलब्ध हुई।
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